जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा की रोचक बातें Rath yatra 2023

                                  जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा की रोचक बातें

Rath yatra 2023

 

विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा जगन्नाथ यात्रा भव्य तम तरीके से आरंभ हो चुकी है. भगवान जगन्नाथ की इस रथ यात्रा की रौनक और खूबसूरती देखने लायक है. भगवान की रथयात्रा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. बता दें कि जब तक ये यात्रा और ये पूजा चलती रहती है, तबतक पूरे इलाके के घरों में और कहीं कोई पूजा नहीं होती, न ही कोई व्रत रखा जाता है. इस रथयात्रा में शामिल होना और रथ को खींचने वालों को बहुत भाग्यवान माना जाता है. कहा जाता है कि भगवान के रथ को खींचने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है. जानें-इस रथ यात्रा rath yatra 2023से जुड़ी खास  बातें…

  1. पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के चार पवित्र धामों में से एक है. वर्तमान मंदिर 800 वर्ष से अधिक प्राचीन है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण, जगन्नाथ रूप में विराजित है. साथ ही यहां उनके बड़े भाई बलराम (बलभद्र या बलदेव) और उनकी बहन देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है.

 

  1. पुरी रथयात्रा के लिए बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ निर्मित किए जाते हैं. रथयात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ, उसके बाद बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है. इसे उनके रंग और ऊंचाई से पहचाना जाता है.

 

  1. बलरामजी के रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं, जिसका रंग लाल और हरा होता है. देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ या ‘पद्म रथ’ कहा जाता है, जो काले या नीले और लाल रंग का होता है, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहते हैं. इसका रंग लाल और पीला होता है.

 

  1. भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलरामजी का तालध्वज रथ 45 फीट ऊंचा और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है.

 

  1. सभी रथ नीम की पवित्र और परिपक्व काष्ठ (लकड़ियों) से बनाए जाते हैं, जिसे ‘दारु’ कहते हैं. इसके लिए नीम के स्वस्थ और शुभ पेड़ की पहचान की जाती है, जिसके लिए जगन्नाथ मंदिर एक खास समिति का गठन करती है.

 

6.इन रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के कील या कांटे या अन्य किसी धातु का प्रयोग नहीं होता है. रथों के लिए काष्ठ काचयन बसंत                पंचमी के दिन से शुरू होता है और उनका निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होता है.

  1. आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को रथयात्रा आरम्भ होती है. ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं. कहते हैं, जिन्हें रथ को खींचने का अवसर प्राप्त होता है, वह महाभाग्यवान माना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, रथ खींचने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है.

 

  1. जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा शुरू होकर पुरी नगर से गुजरते हुए ये रथ गुंडीचा मंदिर पहुंचते हैं. यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा सात दिनों के लिए विश्राम करते हैं. गुंडीचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ के दर्शन को ‘आड़प-दर्शन’ कहा जाता है.

 

  1. गुंडीचा मंदिर को ‘गुंडीचा बाड़ी’ भी कहते हैं. यह भगवान की मौसी का घर है. इस मंदिर के बारे में पौराणिक मान्यता है कि यहीं पर देवशिल्पी विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी की प्रतिमाओं का निर्माण किया था.

 

  1. आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुन: मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं. रथों की वापसी की इस यात्रा की रस्म को बहुड़ा यात्रा कहते हैं.

 

  1. वास्तव में रथयात्रा एक सामुदायिक आनुष्ठानिक पर्व है. इस अवसर पर घरों में कोई भी पूजा नहीं होती है और न ही किसी प्रकार का उपवास रखा जाता है. एक अहम् बात यह कि रथयात्रा के दौरान यहां किसी प्रकार का जातिभेद देखने को नहीं मिलता है.

 

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